जय माता दी दोस्तों आज में आपको  इस  पोस्ट के माध्यम से माता के चमत्कारों के  बारे में और उनकी कथा यहां बताने जा रही हूँ. दोस्तों ध्यान से और पूरा पढियेगा उनकी  महिमा की कहानी ,कैसे-कैसे माँ ने उस पवित्र स्थान में चमत्कार  किये ,माता वैष्णो देवी की महिमा को मानने  वाले  लोग उनकी महिमा गाते नहीं थकते हैं. हमारे धर्मशास्त्रों में कलयुग में लोगों के कष्ट हरने के लिए देवी-देवताओं के नामजप के साथ-साथ कथाएं भी बेहद उपयोगी बताई गई हैं. माँ वैष्णो देवी ने अपने एक परम भक्त पंडित श्रीधर की भक्ति से प्रसन्न होकर उसकी लाज बचाई. माता ने पूरे जगत को  अपनी महिमा का बोध कराया. तब से आज तक लोग इस तीर्थस्थल की यात्रा करते हैं और माता की कृपा पाते हैं. ,तो चलिए इस कथा को शुरू करते है...



माता  वैष्णो देवी  हम हर साल जाते है.  उनके दरबार में जाते ही सारे रोग कष्ट दुःख  सब समाप्त हो जाते है. बस मन में माँ  के प्रति सच्ची श्रद्धा होनी चाहिए, माँ  अपनी  कृपा अवश्य बरसाती  हैं. वैसे तो माता वैष्णो देवी से जुड़ी कई कथाएं हैं, पर जो कथा मैंने सुनी है वो इस प्रकार है.......


कथा के अनुसार 


कटरा से कुछ दूरी पर स्थित हंसाली गांव में मां वैष्णों के परम भक्त पंडित  श्रीधर रहते थे. वह नि:संतान थे जिस वजह से वह  दु:खी रहते थे. एक दिन उन्होंने नवरात्रि पूजन के लिए कुंवारी कन्याओं को बुलवाया. मां वैष्णो कन्या वेश में उन्हीं के बीच आ बैठीं. पूजन के बाद सभी कन्याएं तो चली गईं, पर मां वैष्णो देवी वहीं रहीं और श्रीधर से बोलीं, ‘सबको अपने घर भंडारे का निमंत्रण दे आओ.’ श्रीधर ने उस दिव्य कन्या की बात मान ली और आस-पास के गांवों में भंडारे का संदेश पहुंचा दिया. लेकिन  उनकी इतने लोगो को भोजन  कराने की क्षमता नहीं थी ,फिर भी वह उस कन्या के कहने पर पुरे  गावों  में निमंत्रण दे आये.  वहां से लौटकर आते समय गुरु गोरखनाथ व उनके शिष्य बाबा भैरवनाथ जी के साथ उनके दूसरे शिष्यों को भी भोजन का निमंत्रण दिया



माँ ने स्वयं ही परोसा खाना 


श्रीधर के घर में अनेक गांववासी आकर भोजन के लिए जमा हुए. तब कन्या रूपी मां वैष्णो देवी ने   अपने चमत्कार  से भोजन  निर्माण किया और उन्होंने खुद गावों  के लोगो  को भोजन परोसना  शुरू किया. भोजन परोसते हुए जब वह कन्या भैरवनाथ के पास गई, तब उसने कहा कि मैं तो खीर- पूड़ी की जगह मांस खाऊंगा और मदिरापान करूंगा. तब कन्या रूपी मां ने उसे समझाया कि यह ब्राह्मण  के यहां का भोजन है, इसमें मांसाहार नहीं किया जाता. किंतु भैरवनाथ ने जान-बूझकर अपनी बात पर अड़ा रहा. जब भैरवनाथ ने उस कन्या को पकड़ना चाहा, तब मां ने उसके कपट को जान लिया. मां वायु रूप में बदलकर त्रिकूटा पर्वत की ओर उड़ चलीं. भैरवनाथ भी उनके पीछे गया. 


माँ त्रिकुटा पर्वत  की गुफा  में  चली गई


माँ  भागते-भागते त्रिकुटा  पर्वत  की गुफा  में  छुप  गई   तब  मां की रक्षा के लिए  पवनपुत्र हनुमान भी वहा प्रकट हुए   माँ ने उनसे  कहा  की पुत्र  में नौ  माह  इस  गुफा में  तपस्या करुँगी  तुम एहि मेरी रक्षा के लिए पहरेदारी करना ,तब हनुमानजी कहने लगे की  माँ मुझे बहुत प्यास लगी है मुझे पहले पानी की व्यवस्था  कर दीजिये,तब  माँ  ने  उन्हें प्यास लगने पर धनुष से पहाड़ पर बाण चलाकर एक जलधारा निकाली और उस जल में अपने केश धोए. उसी जल से फिर हनुमान जी ने  अपनी प्यास भी बुझाई 

आज यह पवित्र जलधारा बाणगंगा के नाम से जानी जाती है. इसके पवित्र जल को पीने या इसमें स्नान करने से श्रद्धालुओं की सारी थकावट और तकलीफें दूर हो जाती हैं.


गुफा में माँ ने नौ माह तपस्या की 


माँ वैष्णो  ने त्रिकुटा की  गुफा में प्रवेश कर नौ माह तक तपस्या की. भैरवनाथ भी उनके पीछे वहां तक आ गया. तब एक साधु ने भैरवनाथ से कहा कि तू जिसे एक कन्या समझ रहा है, वह आदिशक्ति जगदम्बा है, इसलिए उस महाशक्ति का पीछा छोड़ दे. भैरवनाथ ने साधु की बात नहीं मानी. तब माता गुफा की दूसरी ओर से मार्ग बनाकर बाहर निकल गईं. यह गुफा आज भी अर्द्धकुमारी या आदिकुमारी या गर्भजून के नाम से प्रसिद्ध है.




भैंरोनाथ के मंदिर के नाम से जाना जाता है


अर्द्धकुमारी के पहले माता की चरण पादुका भी है. यह वह स्थान है, जहां माता ने भागते-भागते मुड़कर भैरवनाथ को देखा था. गुफा से बाहर निकल कर कन्या ने देवी का रूप धारण किया. माता ने भैरवनाथ को चेताया और वापस जाने को कहा. फिर भी वह नहीं माना. माता गुफा के भीतर चली गईं. तब माता की रक्षा के लिए हनुमानजी गुफा के बाहर थे और उन्होंने भैरवनाथ से युद्ध किया. भैरव ने फिर भी हार नहीं मानी. जब वीर लंगूर निढाल होने लगा, तब माता वैष्णवी ने महाकाली का रूप लेकर भैरवनाथ का संहार कर दिया. भैरवनाथ का सिर कटकर भवन से 8 किमी दूर त्रिकूट पर्वत की भैरव घाटी में गिरा. उस स्थान को भैंरोनाथ के मंदिर के नाम से जाना जाता है.


 माँ  के  भवन के नाम से प्रसिद्ध है


जिस स्थान पर मां वैष्णो देवी ने हठी भैरवनाथ का वध किया, वह स्थान पवित्र गुफा माँ  के  भवन के नाम से प्रसिद्ध है. इसी स्थान पर मां महाकाली (दाएं), मां महासरस्वती (मध्य) और मां महालक्ष्मी (बाएं) पिंडी के रूप में गुफा में विराजमान हैं. इन तीनों के सम्मिलत रूप को ही मां वैष्णो देवी का रूप कहा जाता है.


 भैरवनाथ  ने मां से क्षमादान की भीख मांगी


भैरवनाथ को जब अपनी भूल का पश्चाताप हुआ और उसने मां से क्षमादान की भीख मांगी. माता वैष्णो देवी जानती थीं कि उन पर हमला करने के पीछे भैरव की प्रमुख मंशा मोक्ष प्राप्त करने की थी. उन्होंने न केवल भैरव को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति प्रदान की, बल्कि उसे वरदान देते हुए कहा कि मेरे दर्शन तब तक पूरे नहीं माने जाएंगे, जब तक कोई भक्त, मेरे बाद तुम्हारे दर्शन नहीं करेगा. उसी मान्यता के अनुसार आज भी भक्त माता वैष्णो देवी के दर्शन करने के बाद करीब पौने तीन किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई करके भैरवनाथ के दर्शन करने जाते हैं.


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