दोस्तो यू तो आज तक आपने  कई पक्षियों को देखा होगा, हर पक्षी में एक अलग खूबी होती है, कुछ बहुत खूबसूरत दिखते हैं, कुछ अच्छा गाते हैं. एक पक्षी है जो बहुत खूबसूरत घोंसला बनाता है ,जी हाँ आज  हम बया यानि वीवर बर्ड के बारे मे बात करने जा रहे है . आपको बता दें कि यह बहुत ही मेहनती होते है और यह अपना  घोंसला बहुत मेहनत से बुनते हैं.




गौरेया चिड़ियाँ जैसी ही लगती है


दोस्तो यह पक्षी देखने में बिल्कुल  गौरेया जैसी लगती है,लेकिन इसकी चोंच थोड़ी मोटी होती है और पूंछ छोटी होती है. यह  चिट-चिट जैसी आवाज निकालता है.इनको झुंड में रहना बहुत पसंद होता  है.मजे की बात तो यह है कि कई बार तो इनके झुंड में गौरेया भी आ जाते हैं.




इस रंग की होती है


दोस्तो वैसे तो इनकी कई प्रजातियां होती हैं. इनके रंग अलग-अलग तरह के होते हैं लेकिन इनका वैवहार एक समान होता हैं. 


रंग बदलते है


दोस्तो वैसे तो यह अन्य काल में भूरे रंग के होते है,लेकिन  बया पक्षी का रंग प्रणयकाल में गहरा पीला और पंख चमकीले हो जाते हैं. इनका बरसात की शुरूआत होते ही प्रणयकाल शुरू हो जाता है. 


घोंसला बनाते है


जैसे ही बरसात का मौसम शुरू होता है तो ये घोंसला बनाना शुरू कर देते हैं. आम तौर पर ये खेतों के आसपास बबुल,खजूर या बहुत सारी टहनियों वाले  पेड़ों पर घोसले बनाते हैं.  आपने देखा हेगा इनका घोंसला टहनी के सहारे हवा में लटका होता है. यह घोंसले देखने में बेहद सुंदर होते है.





मादा पक्षी  तय करती है घोसले में रहना है या नही 


घोसला बनाने की पूरी जिम्मेदारी नर बया पक्षी की होती है. जब वह आधा घोसला तैयार कर लेते है तब  मादा पक्षी उसका निरीक्षण करती है और जब उसे घोंसला  पसंद नही आता तो वह  घोसले में रहने से इंकार कर देती है. आपने देखा होगा कि अक्सर बया  पक्षी  के धूरे घोसले भी लटके नजर आते  हैं. दोस्तों यह पक्षी अपना घोंसला बनाने में इतनी मेहनत करते है.लेकिन दुःख कि बात तो यह है कि यह  सिर्फ एक बार ही अपना घोंसला उपयोग करते हैं. बया हर सीजन में एक नया घोसला बनाकर ही रहना पसंद करती है.





लुप्त होते जा रही है 



दोस्तों यह  बेहद दुःख  की बात है कि  इतना सुंदर घोंसला बनाने वाले ‘बया’ पक्षी आजकल बहुत कम होते जा रहे है.  जंगलों में भी इनके घोसले बहुत कम देखने को मिलते है. दोस्तों इसका बहुत बड़ा कारण  प्रतिवर्ष वृक्षों की कटाई-छंटाई है.   यदि इसी रफ्तार से ये पक्षी घटते रहे तो हमारी आने वाली पीढ़ी इन जीवों को देख नहीं पाएगी .





वृक्षों की कटाई व पौधों की संख्या में कमी के चलते उनके आश्रय स्थल ही लुप्त हो रहे हैं. शिकारी जीवों की संख्या में इजाफा होने के कारण और शिकारियों द्वारा शिकार के परिणामस्वरूप भी बया कम हो रहे हैं.

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