जय माता दी दोस्तों


दोस्तों नवरात्रि के दिनों में माता दुर्गा के इस स्त्रोत का विधिवत पूजन के बाद पाठ करने से अनेक रूके हुए कार्य पूरे होने लगेंगे.  आपको बता दें कि इस स्त्रोंत का पाठ नवरात्रि में सुबह-शाम करने का विधान है. तो चलिए आपको बताते है दुर्गा माँ का स्त्रोंत का पाठ नीचे पढ़िये....  

1- नमो देव्यै प्रकृत्यै च विधात्र्यै सततं नम:।

कल्याण्यै कामदायै च वृद्धयै सिद्धयै नमो नम:।।

2- सच्चिदानन्दरूपिण्यै संसारारणयै नम:।

पंचकृत्यविधात्र्यै ते भुवनेश्यै नमो नम:।।

3- सर्वाधिष्ठानरूपायै कूटस्थायै नमो नम:।

अर्धमात्रार्थभूतायै हृल्लेखायै नमो नम:।।

4- ज्ञातं मयाsखिलमिदं त्वयि सन्निविष्टं।

त्वत्तोsस्य सम्भवलयावपि मातरद्य।

शक्तिश्च तेsस्य करणे विततप्रभावा।

ज्ञाताsधुना सकललोकमयीति नूनम्।।

5- विस्तार्य सर्वमखिलं सदसद्विकारं।

सन्दर्शयस्यविकलं पुरुषाय काले।।

तत्त्वैश्च षोडशभिरेव च सप्तभिश्च।

भासीन्द्रजालमिव न: किल रंजनाय।।

6- न त्वामृते किमपि वस्तुगतं विभाति।

व्याप्यैव सर्वमखिलं त्वमवस्थिताsसि।

शक्तिं विना व्यवहृतो पुरुषोsप्यशक्तो।

बम्भण्यते जननि बुद्धिमता जनेन।।

7- प्रीणासि विश्वमखिलं सततं प्रभावै:।

स्वैस्तेजसा च सकलं प्रकटीकरोषि।

अस्त्येव देवि तरसा किल कल्पकाले।

को वेद देवि चरितं तव वैभवस्य।।

8- त्राता वयं जननि ते मधुकैटभाभ्यां।

लोकाश्च ते सुवितता: खलु दर्शिता वै।

नीता: सुखस्य भवने परमां च कोटि।

यद्दर्शनं तव भवानि महाप्रभावम्।।

9- नाहं भवो न च विरिण्चि विवेद मात:।

कोsन्यो हि वेत्ति चरितं तव दुर्विभाव्यम्।

कानीह सन्ति भुवनानि महाप्रभावे।

ह्यस्मिन्भवानि रचिते रचनाकलापे।।

10- अस्माभिरत्र भुवे हरिरन्य एव।

दृष्ट: शिव: कमलज: प्रथितप्रभाव:।

अन्येषु देवि भुवनेषु न सन्ति किं ते।

किं विद्य देवि विततं तव सुप्रभावम्।।

11- याचेsम्ब तेsड़्घ्रिकमलं प्रणिपत्य कामं।

चित्ते सदा वसतु रूपमिदं तवैतत्।

नामापि वक्त्रकुहरे सततं तवैव।

संदर्शनं तव पदाम्बुजयो: सदैव।।

12- भृत्योsयमस्ति सततं मयि भावनीयं।

त्वां स्वामिनीति मनसा ननु चिन्तयामि।

एषाssवयोरविरता किल देवि भूया-।

द्वयाप्ति: सदैव जननीसुतयोरिवार्ये।।


13- त्वं वेत्सि सर्वमखिलं भुवनप्रपंचं।

सर्वज्ञता परिसमाप्तिनितान्तभूमि:।

किं पामरेण जगदम्ब निवेदनीयं।

यद्युक्तमाचर भवानि तवेंगितं स्यात्।।

14- ब्रह्मा सृजत्यवति विष्णुरुमापतिश्च।

संहारकारक इयं तु जने प्रसिद्धि:।

किं सत्यमेतदपि देवि तवेच्छया वै।

कर्तुं क्षमा वयमजे तव शक्तियुक्ता:।।

15 धात्री धराधरसुते न जगद् बिभर्ति।

आधारशक्तिरखिलं तव वै बिभर्ति।

सूर्योsपि भाति वरदे प्रभया युतस्ते।

त्वं सर्वमेतदखिलं विरजा विभासि।।

16- ब्रह्माsहमीश्वरवर: किल ते प्रभावा-।

त्सर्वे वयं जनियुता न यदा तु नित्या:।

केsन्ये सुरा: शतमखप्रमुखाश्च नित्या।

नित्या त्वमेव जननी प्रकृति: पुराणा।।

17- त्वं चेद्भवानि दयसे पुरुषं पुराणं।

जानेsहमद्य तव सन्निधिग: सदैव।

नोचेदहं विभुरनादिरनीह ईशो।

विश्वात्मधीरति तम:प्रक्रति: सदैव।।

18- विद्या त्वमेव ननु बुद्धिमतां नराणां।

शक्तिस्त्वमेव किल शक्तिमतां सदैव।

त्वं कीर्तिकान्तिकमलामलतुष्टिरूपा।

मुक्तिप्रदा विरतिरेव मनुष्यलोके।

19- गायत्र्यसि प्रथमवेदकला त्वमेव।

स्वाहा स्वधा भगवती सगुणार्धमात्रा।

आम्नाय एव विहितो निगमो भवत्या।

संजीवनाय सततं सुरपूर्वजानाम्।। 

20- मोक्षार्थमेव रचयस्यखिलं प्रपंचं।

तेषां गता: खलु यतो ननु जीवभाम्।

अंशा अनादिनिधनस्य किलानघस्य।

पूर्णार्णवस्य वितता हि यथा तरंगा:।।

21- जीवो यदा तु परिवेत्ति तवैव कृत्यं।

त्वं संहरस्यखिलमेतदिति प्रसिद्धम्।

नाट्यं नटेन रचितं वितथेsन्तरंगे।

कार्ये कृते विरमसे प्रथितप्रभावा।।

22- त्राता त्वमेव मम मोहमयाद्भवाब्धे-।

स्त्वामम्बिके सततमेमि महार्तिदे च।

रागादिभिर्विरचिते वितथे किलान्ते।

मामेव पाहि बहुदु:खकरे च काले।।

23- नमो देवि महाविद्ये नमामि चरणौ तव।

सदा ज्ञानप्रकाशं मे देहि सर्वार्थदे शिवे।।

।। इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणे तृतीयस्कन्धे विष्णुना कृतं देवीस्तोत्रं ।।


दोस्तों क्या आपको पता हैं दुर्गा चालीसा का नित्य पाठ करने से मां दुर्गा अपने भक्त पर प्रसन्न होती हैं और वे  हर तरह के संकट दूर करती हैं. तो आज हम आपके लिये दुर्गा चालीसा लेकर आये हैं जो इस प्रकार हैं......... 



 

दुर्गा चालीसा

 
नमो नमो दुर्गे सुख करनी।
नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी॥
 
निरंकार है ज्योति तुम्हारी।

तिहूं लोक फैली उजियारी॥
 
शशि ललाट मुख महाविशाला।
नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥
 
रूप मातु को अधिक सुहावे।
दरश करत जन अति सुख पावे॥
 
तुम संसार शक्ति लै कीना।
पालन हेतु अन्न धन दीना॥
 
अन्नपूर्णा हुई जग पाला।
तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥
 
प्रलयकाल सब नाशन हारी।
तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥
 
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥
 
रूप सरस्वती को तुम धारा।
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥
 
धरयो रूप नरसिंह को अम्बा।
परगट भई फाड़कर खम्बा॥
 
रक्षा करि प्रह्लाद बचायो।
हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥
 
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं।
श्री नारायण अंग समाहीं॥
 
क्षीरसिन्धु में करत विलासा।
दयासिन्धु दीजै मन आसा॥
 
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी।
महिमा अमित न जात बखानी॥
 
मातंगी अरु धूमावति माता।
भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥
 
श्री भैरव तारा जग तारिणी।
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥
 
केहरि वाहन सोह भवानी।
लांगुर वीर चलत अगवानी॥
 
कर में खप्पर खड्ग विराजै।
जाको देख काल डर भाजै॥



 
सोहै अस्त्र और त्रिशूला।
जाते उठत शत्रु हिय शूला॥
 
नगरकोट में तुम्हीं विराजत।
तिहुंलोक में डंका बाजत॥
 
शुंभ निशुंभ दानव तुम मारे।
रक्तबीज शंखन संहारे॥
 
महिषासुर नृप अति अभिमानी।
जेहि अघ भार मही अकुलानी॥
 
रूप कराल कालिका धारा।
सेन सहित तुम तिहि संहारा॥
 
परी गाढ़ संतन पर जब जब।
भई सहाय मातु तुम तब तब॥
 
अमरपुरी अरु बासव लोका।
तब महिमा सब रहें अशोका॥
 
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी।
तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥
 
प्रेम भक्ति से जो यश गावें।
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥
 
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई।
जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥
 
जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।
योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥
 
शंकर आचारज तप कीनो।
काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥
 
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को।
काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥
 
शक्ति रूप का मरम न पायो।
शक्ति गई तब मन पछितायो॥
 
शरणागत हुई कीर्ति बखानी।
जय जय जय जगदम्ब भवानी॥
 
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा।
दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥
 
मोको मातु कष्ट अति घेरो।
तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥
 
आशा तृष्णा निपट सतावें।
रिपू मुरख मौही डरपावे॥
 
शत्रु नाश कीजै महारानी।
सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥
 
करो कृपा हे मातु दयाला।
ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला।
 
जब लगि जिऊं दया फल पाऊं ।
तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊं ॥
 
दुर्गा चालीसा जो कोई गावै।
सब सुख भोग परमपद पावै॥
 
देवीदास शरण निज जानी।
करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥
 
॥ इति श्री दुर्गा चालीसा सम्पूर्ण ॥

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